Swami Vivekananda in Hindi, स्वामी विवेकानंद – हिंदी में

  Swami Vivekananda in Hindi, स्वामी विवेकानंद – हिंदी में

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Swami Vivekananda in Hindi:- नमस्कार मित्रों आज हम इस लेख के माध्यम से एक बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व के बारे में जानेंगे (Swami Vivekananda in Hindi) जिसे ऐसा कोई भारतीय नहीं होगा जोना पहचानता हो और(स्वामी विवेकानंद – हिंदी में) जिसने अपनी पहचान सिर्फ भारत में ही न सीमित रह कर पूरे विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी,(Swami Vivekananda in Hindi) जिनके विचारों और और वाणी को सुनकर हर कोई प्रभावित हो जाता था,
ऐसे प्रभावशाली व्यक्ति जिन्हें हम स्वामी विवेकानंद के नाम से पहचानते हैं, आज इस लेख के माध्यम से हम स्वामी विवेकानंद के बारे में वह संपूर्ण जानकारी आपको देना चाहते हैं, जो आप जानते होंगे या जो आपको जानने में रुचि होगी स्वामी विवेकानंद एक ऐसे व्यक्ति थे,
जिन्होंने जन्म भले ही भारत में लिया हो, लेकिन वह हमेशा सारे विश्व के बारे में अच्छे विचारों के साथ आगे बढ़े (स्वामी विवेकानंद – हिंदी में) और उन्होंने सारे विश्व में भारत का प्रथम लहराया तथा(Swami Vivekananda in Hindi) सारे विश्व को हिंदू धर्म के साथ-साथ भारत का प्रतिनिधित्व इन्होंने बड़े ही बखूबी तौर पर पूरा किया, स्वामी विवेकानंद का जन्म बंगाल के कलकत्ता (जिसे अब कोलकाता के नाम से भी जाना जाता है) मैं एक प्रसिद्ध कोलकाता हाई कोर्ट के वकील के घर हुआ (स्वामी विवेकानंद – हिंदी में)

1.जन्म एवं बचपन 

2.स्वामी विवेकानंद की शिक्षा

3.व्यक्तिगत जीवन एवं कार्य

4.स्वामी विवेकानंद  की मृत्यु

5. शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त

स्वामी विवेकानंद का जन्म एवं बचपन 

स्वामी विवेकानंद जी का जन्म बंगाल के कोलकाता में 12 जनवरी सन 1863 में हुआ इनके बचपन का वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था तथा इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त एवं माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था, 
इनके पिता कोलकाता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील तथा माता एक धार्मिक विचारों वाली महिला जो अपना अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा अर्चना में व्यतीत करने वाली स्त्री थी, स्वामी विवेकानंद के बचपन के बारे में बात की जाए तो नरेंद्र बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के और एक नटखट बालक थे, 
जो अपने दोस्तों के साथ शरारत करते एवं अपने अध्यापकों को अपनी शरारत तो से परेशान करने से नहीं चूकते थे विवेकानंद जी के घर पर माता द्वारा प्रतिदिन नियम पूर्वक रोज पूजा पाठ किया जाता था, इनकी माता जी को रामायण महाभारत आदि सुनने का बहुत शौक था, जिस का यह परिणाम हुआ,
 कि बचपन से ही स्वामी विवेकानंद के घर में आध्यात्मिक वातावरण के कारण इनके मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उन्हें प्राप्त करने की लालसा दिखाई देने लगी, और यह धीरे-धीरे ईश्वर के बारे में जानने के लिए अधिक उत्साहित तथा लालायित होने लगे, कई बार तो ऐसा होता था, 
की इनके माता-पिता तथा कथावाचक इनके प्रश्नों का जवाब देने में असमर्थ महसूस करते थे, तो परमात्मा को पाने के उद्देश्य से स्वामी विवेकानंद ब्रह्म समाज गए लेकिन वहां उनके मन को वह संतोष प्राप्त नहीं हुआ सन 1884 में विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई एवं घर का भार नरेंद्र के सिर पर आ गया


स्वामी विवेकानंद का परिवार
नाम नरेंद्र नाथ दत्त
पिता का नाम विश्वनाथ दत्त
माता का नाम भुवनेश्वरी देवी
भाई का नाम ज्ञात नहीं है |
बहन का नाम ज्ञात नहीं है |
पत्नी / पति का नाम ज्ञात नहीं है |
बेटे का नाम ज्ञात नहीं है |
बेटी का नाम ज्ञात नहीं है |
गर्लफ्रेंड / बॉयफ्रेंड ज्ञात नहीं है |

स्वामी विवेकानंद की शिक्षा

बालक नरेंद्र बचपन से ही बहुत तेज बुद्धि के थे, यदि हम उनकी शिक्षा के बारे में जाने तो सन 1871 में ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन संस्थान मेनका दाखिला 8 साल की उम्र में कराया गया, जहां पर इनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई नरेंद्र ने पश्चिमी तट ,पश्चिम दर्शन व यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन (जिसे आप स्कॉटिश चर्च कॉलेज भी कहा जाता है) से पूर्ण किया,
 इन्होंने ललित कला की परीक्षा सर 8881 में उत्तीर्ण की, और कला में स्नातक की डिग्री 1864 में पूरी कर ली, नरेंद्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार , ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन इन सभी के कामों का अध्ययन किया। 
उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन का बंगाली में अनुवाद 1860 में किया। ये हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से काफी प्रभावित थे । पश्चिम दार्शनिकों के अध्यन के साथ ही इन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सीखा , 


विलियम हेस्टी (महासभा संस्था के प्रिंसिपल) ने लिखा,”नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है। मैंने काफी विस्तृत और बड़े इलाकों में यात्रा की है,लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला का एक भी बालक कहीं नहीं देखा, यहाँ तक की जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं।”  अनेक बार इन्हें श्रुतिधर भी कहा गया है। 

स्वामी विवेकानंद का व्यक्तिगत जीवन एवं कार्य

जब नरेंद्र ब्रह्म समाज में जाकर भी अपने प्रश्नों का उत्तर वह अपने मन को शांत ना कर पाए तो रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा इनके द्वारा कई सुनने पर यह रामकृष्ण परमहंस से तर्क करने के विचार से उनके पास गए, किंतु यह रामकृष्ण परमहंस से प्रभावित हो गए और रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बन गए और 25 वर्ष की आयु में गेरुआ वस्त्र पहन लिया
 दीक्षा लेने के बाद सन्यास ग्रहण करने के बाद इनका नाम विवेकानंद हो गया और इन्हें सभी स्वामी विवेकानंद के नाम से जानने लगे, परमहंस जी ने इन्हें अपना आत्म साक्षात्कार करवाया, स्वामी विवेकानंद अपना संपूर्ण जीवन अपने गुरु स्वामी पर रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे ,
नरेंद्र परमहंस जी के सभी शिष्यों में प्रमुख हो गए, यह अपने गुरु के प्रति इतने निष्ठावान थे ,कि अपने गुरु के शरीर त्याग के दिनों में उन्होंने अपने घर तथा परिवार की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, अपने गुरु की सेवा में शतक हाजिर रहे, रामकृष्ण परमहंस का शरीर अत्यंत रुग्ण हो चुका था,
 वह अपने इन अंतिम दिनों में कैंसर जैसी भयानक बीमारी से जूझ रहे थे, उस परिस्थिति में स्वामी विवेकानंद अपने गुरु के प्रति पूरी निष्ठा दिखाते हुए इन्होंने अपने गुरु का बहुत ध्यान रखा तथा उनकी साफ सफाई करते रहे, कैंसर के कारण गले में से थूंक, रक्त, कफ आदि निकलता रहता था।
 एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह उनसे नही देखा गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम को दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पान कर गए। 
यह घटना यह बताती है कि स्वामी विवेकानंद जी की अपने गुरु के प्रति कितनी गुरु भक्ति गुरु सेवा और अनन्य निष्ठा थी कुछ समय बाद अमेरिका के शिकागो मैं विश्व धर्म परिषद होना थी, जिसमें स्वामी विवेकानंद जी भारत के प्रतिनिधि के तौर पर वहां पहुंचे उस समय यूरोप तथा अमेरिका भारत वासियों को हीन दृष्टि से देखते थे, 
वहां मौजूद कुछ लोगों ने यह भी प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को उस सर्व धर्म धर्म परिषद में बोलने का समय ना मिले, ऐसी स्थिति में एक अमेरिकन प्रोफेसर के थोड़े प्रयास करने के बाद उन्हें उस सर्वधर्म परिषद में बोलने का थोड़ा सा समय मिल पाया,
 उस थोड़े से समय में लोग और वहां उपस्थित सभी विद्वान उनके विचारों को सुनकर अत्यंत प्रभावित हुए, जिसके फलस्वरूप अमेरिका में उनका बहुत ही भव्य तरीके से स्वागत किया गया ,और वहां उनके भक्तों का एक बहुत बड़ा समुदाय बन गया 
तत्पश्चात स्वामी विवेकानंद जी 3 वर्ष तक अमेरिका में ही रहे और उन्होंने वहां के लोगों को भारतीय भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योत प्रदान की


स्वामी विवेकानंद की व्यक्तिगत जानकारी
वास्तविक नाम स्वामी विवेकानंद
उपनाम नरेंद्र नाथ दत्त
व्यवसाय आध्यात्मिक गुरु
जन्मतिथि 12 जनवरी 1863,
जन्मस्थान कोलकाता
धर्म हिन्दू
जाति ज्ञात नहीं है

स्वामी विवेकानंद  की मृत्यु

उनके ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्चभर व्याप्त हो गई जीवन के अंतिम दिन में भी उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा था कि “एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक मैंने क्या किया है।” प्रत्यदर्शियों के अनुसार जीवन के अंतिम दिन भी उन्होंने अपने ‘ध्यान’ करने की दिनचर्या को नहीं बदला था 
 और प्रात: दो तीन घंटे ध्यान किया। उन्हें दमा और शर्करा के अतिरिक्त अन्य शारीरिक बीमारियों ने घेर रखा था। उन्होंने कहा भी था, ‘यह बीमारियाँ मुझे चालीस वर्ष के आयु भी पार नहीं करने देंगी।’ 4 जुलाई, 1902 को बेलूर में रामकृष्ण मठ में उन्होंने ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिए। 
उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मंदिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानंद तथा उनके गुरु रामकृष्ण के संदेशों के प्रचार के लिए 130 से अधिक केंद्रों की स्थापना की।



स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त के बारे में जानते हैं –

  1.  शिक्षा ऐसी हो, जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास पूर्ण रूप से हो सके
  2.  शिक्षा ऐसी हो जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक को आत्मनिर्भर बना सके
  3.  बालक एवं बालिकाओं दोनों को बिना किसी भेदभाव के समान शिक्षा देनी चाहिए। 
  4.  धार्मिक शिक्षा को पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए। 
  5. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को सम्मिलित करना चाहिए। शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती हो 
  6.  शिक्षक एवं छात्र के आपस के सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए। 
  7.  सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया करना चाहिये। 
  8.  देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा की शुरुवात परिवार से होनी चाहिए।
  9.  शिक्षा ऐसी हो जो सीखने वाले को जीवन संघर्ष से लड़ने की आजीवन शक्ति दे सके।
  10.  स्वामी विवेकानंद के अनुसार व्यक्ति को अपनी रूचि को सदैव महत्व देना महत्व देना चाहिए|